Monday, 30 January 2017

उत्तराखंड चुनाव 2017

मुद्दे: उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में सुनाई पड़ेगी भ्रष्टाचार, दलबदल और विकास की गूंज













उत्तराखंड के सियासी अखाड़े में चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस, सत्ता में दोबारा वापसी का दांव दोनों ही दल आज तक नहीं लगा पाये हैं. राज्य बनाने के बावजूद बीजेपी 2002 का पहला विधानसभा चुनाव हार बैठी. विकास पुरुष का तमग़ा देने के बावजूद कांग्रेस 2007 में सत्ता से बाहर हो गयी थी. 2012 में यही हाल बीजेपी का रहा. अब 2017 का समर है. क्या कांग्रेस सत्ता की हर बार की अदल-बदल के मिथक तोड़ पायेगी या बीजेपी ट्रेंड दोहरायेगी!
दरअसल, जिस तरह से राज्य की सत्ता बीजेपी और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है. वैसे ही सियासी मुद्दे भी इस चौखट से उस चौखट चक्कर लगाते रहे हैं. खासकर हर चुनाव में भ्रष्टाचार मुद्दा बनता रहा है. लेकिन हर बार जो विपक्ष में रहा वो इस मुद्दे को ढाल बनाकर जंग जीत गया. हालांकि सत्ता मिलने के बाद भ्रष्टाचार के आरोप ठंडे बस्ते में जाते रहे.
रावत सरकार भी सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के मोर्चे पर विपक्ष के निशाने पर रही है. शराब, खनन के अलावा 18 मार्च के बाद विधायकों की खरीद-फ़रोख़्त के आरोप भी विपक्ष के तरकश के धारदार तीर हैं. बीजेपी एफएलटू शराब नीति भी और नदियों में अवैध खनन को मुद्दा बनाये हुए हैं. जबकि खंडूड़ी सरकार के लोकायुक्त को ठंडे बस्ते में डालने से लेकर आपदा राहत और पुनर्वास में घोटाले का मुद्दा उठा रही है.
जबकि हरीश रावत कांग्रेस में बग़ावत की पटकथा के लिये बीजेपी आलाकमान को जिम्मेदार ठहराकर राजनीतिक अस्थिरता का आरोप लगा रहे हैं. कांग्रेस आपदा राहत का पूरा बजट रोकने का आरोप भी केन्द्र पर लगा रही है. वैसे खुद हरीश रावत भी इस चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिये सबसे बड़ा मुद्दा बनते दिख रहे हैं. बीजेपी 'खाता न बही हरीश रावत जो कहे वो सही' का हल्ला कर हरदा की एकला चलो नीति का उधेड़ रही है. जबकि कांग्रेस की तरफ से चुनावी व्यूह रचनाकार भी हरीश रावत बन रहे हैं और मोर्चा भी वहीं संभाल रहे हैं.
बहरहाल इस चुनावी समर में भ्रष्टाचार का मुद्दा तो केन्द्र में रहेगा ही. स्टिंग सीडी, सीबीआई जांच और कांग्रेस विधायकों की बग़ावत सबसे बड़े मुद्दे होंगे.
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